न्याय धारा/ कानपुर नगर। मंगलवार 26 मई 2026 (सूत्र/सूवि/पीआईबी/संवाददाता) सूर्य उत्तरायण, अधिक जेष्ठ मास शुक्ल पक्ष की एकादशी (पुरुषोत्तम मास), ग्रीष्म ऋतु २०८३ रौद्र नाम संवत्सर। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक की प्रेरणा से हुए महत्वपूर्ण शोध में शिक्षा में AI के सुरक्षित और सकारात्मक उपयोग की नई राह दिखाई है।
दरअसल मोबाइल पर मिलने वाले सुझाव, ऑनलाइन पढ़ाई, डिजिटल लाइब्रेरी, करियर सलाह, रिसर्च टूल और परीक्षा मूल्यांकन — आज के विद्यार्थियों की दुनिया तेजी से Artificial Intelligence (AI) से जुड़ती जा रही है। लेकिन क्या यह तकनीक केवल सुविधा दे रही है या धीरे-धीरे विद्यार्थियों की सोच, आत्मविश्वास और पहचान को भी प्रभावित कर रही है?
इसी महत्वपूर्ण विषय पर शिक्षा विभाग में एक बेहद रुचिकर और समय की मांग से जुड़ा शोध हुआ। विभाग के सहायक आचार्य डॉ विमल सिंह के निर्देशन में छात्रा मानसी सिंह ने 'अ स्टडी ऑफ एल्गोरिदमिक बायस ऑन इंटरसेखक्शनल आइडेंटिटीज: अ सोशियो एजूकेशनल स्टडी अमंग पोस्टग्रेजुएट स्टूडेंट्स ऑफ कानपुर सिटी' विषय पर शोध किया। शोध में विशेषज्ञ के रूप में Dr. Anshu Singh का महत्वपूर्ण योगदान रहा। शोध में 211 स्नातकोत्तर विद्यार्थियों तथा IT विशेषज्ञों को शामिल किया गया। अध्ययन में पाया गया कि AI तकनीकें विद्यार्थियों के लिए नई संभावनाएँ खोल रही हैं, लेकिन कई बार यही तकनीकें अनजाने में कुछ विद्यार्थियों को अधिक अवसर और कुछ को कम अवसर देती दिखाई देती हैं।
सबसे दिलचस्प बात यह सामने आई कि शहरी विद्यार्थी AI में मौजूद पक्षपात (Bias) को जल्दी पहचान लेते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र के कई विद्यार्थी ऐसी समस्याओं को महसूस तो करते हैं, लेकिन उन्हें सही शब्दों में समझ नहीं पाते। शोधकर्ताओं ने इसे “Conscious Divide” नाम दिया।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि M.Ed. के विद्यार्थी तकनीक के सामाजिक और नैतिक प्रभावों को लेकर अधिक जागरूक हैं। यानी जो विद्यार्थी भविष्य में शिक्षक बनने जा रहे हैं, वे AI को केवल मशीन नहीं बल्कि समाज और शिक्षा को प्रभावित करने वाली शक्ति के रूप में देख रहे हैं। शोध में कई विद्यार्थियों ने यह भी कहा कि AI आधारित रिसर्च टूल्स विज्ञान और तकनीकी विषयों के लिए अधिक उपयोगी दिखते हैं, जबकि कला और सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थियों को अपेक्षाकृत कम सहायता मिलती है। यह संकेत देता है कि आने वाले समय में AI को अधिक संतुलित और समावेशी बनाने की आवश्यकता है।
हालाँकि शोध का सबसे सकारात्मक पक्ष यह रहा कि इसमें समस्या के साथ समाधान भी प्रस्तुत किए गए। शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों में “Critical AI Literacy” शुरू की जानी चाहिए, ताकि विद्यार्थी समझ सकें कि AI कैसे काम करता है और उसका सही उपयोग कैसे किया जाए। साथ ही ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए विशेष डिजिटल जागरूकता कार्यक्रम चलाने की भी आवश्यकता बताई गई। यह शोध केवल तकनीक की कमियों की चर्चा नहीं करता, बल्कि यह विश्वास दिलाता है कि यदि AI का उपयोग संवेदनशीलता, समान अवसर और नैतिक मूल्यों के साथ किया जाए, तो यह भारत की शिक्षा व्यवस्था को और अधिक आधुनिक, प्रभावशाली और विद्यार्थी-केंद्रित बना सकता है। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर का यह शोध आज के डिजिटल युग में शिक्षा और तकनीक के संतुलन की दिशा में एक प्रेरणादायक पहल माना जा रहा है।

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