लेखक विद्यासागर त्रिपाठी मूसानगर कानपुर देहात उप्र.
न्याय धारा/ कानपुर नगर। रविवार 19अप्रैल 2026 (सूत्र/लेख) सूर्य उत्तरायण, बैशाख मास शुक्ल पक्ष की द्वितीया, बसंत ऋतु २०८३ रौद्र नाम संवत्सर। अब किसी विचारधारा के पक्ष य विपक्ष में तर्क वितर्क करने का मन नहीं करता ! क्योंकि अब समझ में आ गया है कि किसी भी विचारधारा का अब कोई स्थाई अस्तित्व शेष नहीं बचा है ! कब कौन अपनी विचारधारा को त्यागकर कब कोई नई विचारधारा की राह पकड़ ले इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता ! ऐसे में किसी से भी वैचारिक तर्क वितर्क बहस करके अपना समय बर्बाद करना होता है।वैचारिक बहस के बाद परिणाम सार्थक नहीं,सिर्फ थकान देता है, पूर्व में किसी विरोधी विचारधारा को पढ़कर य सुनकर उस पर तार्किक प्रतिउत्तर देना जरूरी लगता था,अपनी विचारधारा को सत्य साबित करने के लिए हर सम्भव तर्क वितर्क करता था, लेकिन वर्तमान में आते आते पल पल बदल रही विचारधाराओं को देखकर यह लगने लगा है कि अब कोई भी नैतिकता पूर्ण विचारधारा शेष नहीं है,सिर्फ स्वार्थी विचारधारा शेष बची है ! ऐसे में वैचारिक तर्क वितर्क बहस आदि करने का कोई औचित्य दिखाई नहीं देता ! ऐसे हालातों में अब तर्क वितर्क करने के स्थान पर शान्ति पूर्वक पल पल बदल रहे भारत के सामाजिक घटनाक्रमों को शान्ति के साथ बैठकर देखना एवं बदलती हुई विचारधाराओं से आगे आने वाले परिणामों पर निगाह रखने में रुचि शेष बची है !
अब तर्क वितर्क करने से चुप रहना आसान लगता है,क्योंकि अब हर व्यक्ति अपने ही झूठ को सत्य साबित करने में जी रहा है और किसी के झूठ को सत्य में बदलने की कोशिश करना सिर्फ खुद का समय बर्बाद करना एवं मानसिक पीड़ा झेलने जैसा है,धीरे धीरे यह एहसास हो गया है कि स्वार्थों भरी वर्तमान विचारधारा में बहस करना जरूरी नहीं है ।
कुछ लोग कुछ समझना नहीं चाहते सिर्फ बोलना चाहते हैं,इसलिए अब उनसे न तो बहस करते हैं,न सफाई देते हैं,बस थोड़ा दूर हो गये हैं, क्योंकि कुछ लोगों की विचारधाराओं के साथ रहकर नहीं,उनसे दूर रहकर ही बचा जा सकता है,कहते है कुछ सिद्धांत ऐसे होते हैं जो जवाब देने से नहीं,चुप रह जाने में ही मिलते हैं,अब हमें साबित करने में नहीं,बल्कि स्वयं को संभालने में अपना समय लगाना चाहिए हैं यही समझदारों की समझदारी होगी,मूर्खों के साथ स्वार्थियों का बाजार सज गया है ! और गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है कि -
फूलहिं फरहिं न बेंत जदपि सुधा वर्षहिं जलधि ।
मूरख हृदय न चेत चंह गुरु मिलहिं विरंच सम ॥

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