न्याय धारा/कानपुर नगर। शनिवार 14मार्च 2026 (सूत्र/संवाददाता) सूर्य उत्तरायण, चैत्र मास कृष्ण पक्ष की एकादशी, बसंत ऋतु २०८२ कालयुक्त नाम संवत्सर। हिन्दुस्तानी एकेडमी, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज एवं रामसहाय राजकीय महाविद्यालय, बैरी, शिवराजपुर, कानपुर नगर के संयुक्त तत्वावधान में “हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष” विषय पर द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी (हाइब्रिड मोड) का शुभारम्भ दिनांक 14 मार्च 2026 को प्रातः 10:30 बजे छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर में सम्पन्न हुआ। इस संगोष्ठी का आयोजन उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश के सहयोग से किया गया।
उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के माननीय कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. (डॉ.) शशि कपूर (संयुक्त निदेशक, उच्च शिक्षा विभाग, प्रयागराज) एवं प्रो. (डॉ.) दिलीप सरदेसाई (पूर्व प्राचार्य एवं संगठन मंत्री, राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, उत्तर प्रदेश) उपस्थित रहे। कार्यक्रम में अनेक विद्वान, शिक्षाविद, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राओं की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का शुभारम्भ माँ सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। तत्पश्चात छात्र-छात्राओं द्वारा सरस्वती वंदना एवं स्वागत गीत “स्वागतम्” की प्रस्तुति दी गई। सभी अतिथियों का पुष्पगुच्छ एवं शॉल भेंट कर सम्मान किया गया।
स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रो. (डॉ.) अपर्णा सिंह, प्राचार्य, रामसहाय राजकीय महाविद्यालय ने सभी अतिथियों का हार्दिक अभिनंदन किया तथा संगोष्ठी के उद्देश्य एवं प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।मुख्य अतिथि प्रो. विनय कुमार पाठक ने हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक परम्परा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्य एवं निष्पक्ष जानकारी प्रदान करना है। उन्होंने वर्तमान समय में मीडिया की बदलती प्रकृति, तकनीकी हस्तक्षेप, बाजारवाद तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते प्रभाव को पत्रकारिता के लिए चुनौतीपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि भविष्य में तकनीक के साथ मानवीय संवेदनशीलता और नैतिक मूल्यों का संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होगा।
प्रो. (डॉ.) दिलीप सरदेसाई एवं प्रो. (डॉ.) शशि कपूर ने भी उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए विषय की सामयिकता पर बल दिया और विद्यार्थियों को जिम्मेदार एवं मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता की दिशा में प्रेरित किया।
सरस्वत वक्ता के रूप में पद्मश्री श्री विजय दत्त, निदेशक, माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल ने हिंदी पत्रकारिता के विकास की समयरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने ‘उदन्त मार्तण्ड’ से लेकर आधुनिक डिजिटल पत्रकारिता तक की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि पूर्वकाल में सीमित संसाधनों के बावजूद पत्रकारिता अत्यंत प्रभावशाली थी, जबकि आज संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद प्रभावशीलता में कमी दिखाई देती है। उन्होंने पत्रकारिता को समाज को दिशा देने वाली सशक्त शक्ति बताया।
द्वितीय सरस्वत वक्ता श्री अनुप कुमार शुक्ल, महासचिव, कानपुर इतिहास समिति (स्थापना 1946) ने हिंदी पत्रकारिता के इतिहास पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने पंडित जुगलकिशोर शुक्ल एवं ‘उदन्त मार्तण्ड’ के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि हिंदी पत्रकारिता त्याग, संघर्ष और राष्ट्रीय चेतना की भूमि पर विकसित हुई। साथ ही ‘प्रताप’ समाचार पत्र एवं गणेश शंकर विद्यार्थी के योगदान को स्मरण करते हुए उन्होंने पत्रकारिता को राष्ट्र निर्माण का सशक्त माध्यम बताया।
उद्घाटन सत्र के उपरान्त आयोजित तकनीकी सत्र में विषय के समकालीन आयामों पर गंभीर विमर्श हुआ।
तकनीकी सत्र के प्रमुख वक्ता श्री फिरोज नकवी, वरिष्ठ पत्रकार (नई दिल्ली/अलीगढ़) रहे। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि पत्रकारिता का मूल स्वरूप सत्य की खोज और जनपक्षधरता रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भगत सिंह द्वारा 1924 में दिल्ली दंगों की ग्राउंड ज़ीरो से की गई रिपोर्टिंग आज की सनसनीप्रधान पत्रकारिता से भिन्न थी। उस समय पत्रकारिता का उद्देश्य जनचेतना जागृत करना था, न कि केवल आकर्षण या TRP बढ़ाना। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी पत्रकारिता का समग्र और प्रामाणिक इतिहास अभी पूर्ण रूप से लिखा जाना शेष है।
तकनीकी सत्र में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एक शोधार्थी ने “हिन्दी की क्रांतिकारी पत्रकारिता” विषय पर अपना शोध-पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन के दौर की वैचारिक पत्रकारिता पर प्रकाश डाला गया।
अंत में वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक, लोकसभा एवं राज्यसभा से संबद्ध श्री अरविंद कुमार सिंह ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि ब्रिटिश शासनकाल में कई रियासतों ने ‘प्रताप’ जैसे निर्भीक समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगाए, क्योंकि वे जनता की आवाज़ को निर्भीकता से उठाते थे। उन्होंने सरोजिनी नायडू के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने पत्रकारिता और भारत की महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। साथ ही विजयलक्ष्मी पंडित के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने भारतीय महिला नेतृत्व की ऐतिहासिक भूमिका को स्मरण किया।
तकनीकी सत्र में प्रतिभागियों द्वारा शोधपत्र प्रस्तुत किए गए तथा संवाद के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों—विशेषकर डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता—पर सार्थक चर्चा हुई।
कार्यक्रम का संचालन संगोष्ठी की संयोजिका डॉ. सुमन शुक्ला ने किया तथा उद्घाटन सत्र का समापन डॉ. आलोक पांडे द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।


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