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जैन दर्शन के शोध क्षेत्र में कानपुर विश्वविद्यालय की पहल सराहनीय है - दीक्षा जैन

न्याय धारा/कानपुर नगर। शुक्रवार 13मार्च 2026 (सूत्र/संवाददाता) सूर्य उत्तरायण, चैत्र मास कृष्ण पक्ष की दसमी, बसंत ऋतु २०८२ कालयुक्त नाम संवत्सर। छत्रपति शाहू जी महाराज वि.वि., कानपुर परिसर स्थित आचार्य विद्यासागर सुधासागर जैन शोध पीठ तथा दीनदयाल शोध केन्द्र के तत्त्वाधान में तीर्थंकर ऋषभदेव के जन्म कल्याणक महोत्सव के पावन शुभावसर पर दिनांक 13-14 मार्च 2026 को तीर्थंकर ऋषभदेव : उनका सामाजिक-सांस्कृतिक अवदान विषय पर दीनदयाल सभागार में प्रो. विनय कुमार पाठक, कुलपति जी की अध्यक्षता एवं मार्गदर्शन में आयोजित किया गया।

मंगलाचरण आर्जव जैन ने प्रस्तुत किया। प्राकृत मंगलाचरण श्रीमती अंशु जैन आदि ने प्रस्तुत किया। मंच पर उपस्थित विद्वान डॉ. नीता दवे जैन, प्रति-कुलपति प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी तथा श्री प्रदीप जैन, मुख्य-अतिथि श्रीमती दीक्षा जैन का सम्मान पुष्पगुच्छ देकर स्वागात किया।

सभागार में उपस्थित विद्वानों को संबोधित करते हुए मुख्य-अतिथि दीक्षा जैन ने कहा कि जैन दर्शन के शोध क्षेत्र में कानपुर विश्वविद्यालय की पहल सराहनीय है, यह जानकर प्रसन्नता हुई कि यहाँ पर आचार्य विद्यासागर सुधासागर जैन शोध पीठ के माध्यम से जैन दर्शन के विकास के लिए विभिन्न पाठ्यक्रम और प्रयास संचालित किये जा रहे हैं। उनहोंने यह भी कहा कि आज पूरी दुनियां में सांप-सीढ़ी का खेल सभी खेलते हैं परन्तु यह बात शायद ही यह जानते हो यह सांप सीढ़ी का खेल जैन धर्म की देन हैं। माननीय कुलपति जी ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि भगवान ऋषभदेव ने जो शिक्षा दी वह आज की दुनिया में प्रासंगिक है। कोइ भी धर्म या दर्शन तभी बढ़ाते हैं जब वह सभी के लिए सुलभ हों। नई पीढ़ी को धर्म और दर्शन की जानकारी होना चाहिए वही भविष्य में उसको आगे लेकर जाते हैं।

उन्होंने यह भी कहा की जब मैं कोटा में कुलपति था तब महाराज मुनि सुधासागर जी का सान्निध्य प्राप्त हुआ। उन्होंने जैन आहारचर्या और दिनचर्या को लोगों को अपने जीवन में उतारने का सन्देश दिया। विशिष्ट वक्तव्य में प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी, प्रति-कुलपति ने भगवान ऋषभदेव द्वारा किये गए कार्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि असि,मसि और कृषि की भारतीय संस्कृति भगवान ऋषभदेव की देन है। जैन धर्म का भारतीय संस्कृति में जो योगदान है वह कृषि ही नहीं, कला संस्कृति और आर्केटेक्चर में भी नजर आता है। जैन दर्शन के अपरिग्रह आस्तेय, अहिंसा आदि शिक्षाओं का पालन करके अपने जीवन को शान्ति सुख समृद्धि पूर्ण बना सकते हैं। डॉ. नीता दवे जैन ने अपने अतिथि-वक्तव्य में कहा कि भगवान ऋषभदेव भारतीय सभ्यता के प्रथम शिल्पी थे। उनहोंने संयम को प्रमुखता दी। 

आदिनाथ ने समाज की व्यवस्था का निर्माण किया। मुख्य-वक्ता डॉ. धर्मेन्द्र कुमार जैन ने योगेश्वर श्रीकृष्ण और भगवान् आदिनाथ ऋषभदेव की शिक्षाओं के एक सामान होने का उल्लेख किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रिया जैन, स्वागत-वक्तव्य डॉ. सर्वेश मणि त्रिपाठी तथा विषय- प्रवर्तन प्रो. अशोक कुमार जैन तथा डॉ. श्रवण कुमार द्विवेदी ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में निरज दाहाल,नेपाल,  महेंद्र कटारिया, प्रदीप जैन, डॉ. अनूप कुमार जैन, अनिल जैन, कमल जैन, आमोद जैन, राजीव जैन, डॉ. कोमलचंद्र जैन, आचार्य राहुल जैन, जितेन्द्र कुमार जैन आदि उपस्थित रहें। 

द्वितीय सत्र की अध्यक्षता प्रो. अशोक कुमार जैन, विशिष्ट वक्ता अनुभव जैन, मुख्य-अतिथिनिरज दाहाल की उपस्थिति रही। मंगलाचरण आर्जव जैन तथा सात शोध छात्रों ने शोध पत्र वाचन किये। जिसमें डॉ. अंशु जैन, डॉ. प्रिया जैन, डॉ. राकेश मिश्रा, आर्जव जैन, डॉ. आरती जैन आदि ने अपने शोध पत्रों का वाचन किया। 

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