कानपुर नगर। बुधवार 11फरवरी 2026 (सूत्र/संवाददाता) सूर्य उत्तरायण, फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की दसमी, शिशिर ऋतु २०८२ कालयुक्त नाम संवत्सर। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के सेना नायक तात्या टोपे सभागार (सीनेट हॉल) में बुधवार को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 58वीं पुण्यतिथि श्रद्धा और विचार के साथ मनाई गई। कार्यक्रम में एकात्म मानववाद के दर्शन, भारतीय संस्कृति और राष्ट्र चिंतन पर विस्तृत चर्चा हुई। वक्ताओं ने पं. दीनदयाल के विचारों को वर्तमान समय में प्रासंगिक बताते हुए युवाओं से उनके सिद्धांतों को आत्मसात करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. राम माधव, विशिष्ट अतिथि सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता दिलीप कुमार दुबे, संघ प्रांत संघचालक भवानी भीख तिवारी, प्रतिकुलपति प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी तथा कुलसचिव राकेश कुमार मिश्र द्वारा पं. दीनदयाल उपाध्याय के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इसके पश्चात विश्वविद्यालय के दीनदयाल शोध केंद्र के उपनिदेशक डॉ. दिवाकर अवस्थी ने सभी अतिथियों का परिचय कराया।मुख्य अतिथि डॉ. राम माधव ने अपने संबोधन में एक गंभीर प्रश्न उठाया—“क्या पश्चिम का भौतिकवाद मानवता को वह शांति दे पाया, जिसका वादा किया गया था?” उन्होंने कहा कि 1965 में प्रतिपादित ‘एकात्म मानववाद’ का दर्शन आज के खंडित और विभाजित समाज को जोड़ने का प्रभावी सूत्र है। उन्होंने बताया कि जब विश्व पूंजीवाद और साम्यवाद के दो ध्रुवों में बंटा हुआ था, तब पं. दीनदयाल उपाध्याय ने एक वैकल्पिक विचारधारा प्रस्तुत की, जो भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों पर आधारित थी।
डॉ. माधव ने कहा कि वर्तमान समय में पूंजीवादी व्यवस्था भी कई देशों में असंतुलन और असमानता को जन्म दे रही है। ऐसे में एकात्म मानववाद का सिद्धांत समाज के संतुलित और समग्र विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे दीनदयाल जी के विचारों को समझें और देश की उन्नति में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति स्वयं प्रकाशित होने के साथ-साथ दूसरों को भी आलोकित करने की क्षमता रखती है। “भारत का चिंतन कर्तव्य केंद्रित है, अधिकार केंद्रित नहीं। अंतिम व्यक्ति का उत्थान ही दीनदयाल जी का मूल उद्देश्य था,” उन्होंने कहा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देश का विकास केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं, बल्कि धर्म आधारित नैतिक मूल्यों के आधार पर होना चाहिए। भारतीय युवा कर्तव्य भावना से प्रेरित होकर राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। दीनदयाल उपाध्याय ने अर्थशास्त्र, राजनीति और सामाजिक चिंतन के क्षेत्र में व्यापक कार्य किया, जो आज भी मार्गदर्शक है। विशिष्ट अतिथि सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता दिलीप कुमार दुबे ने कहा कि भारत की चेतना दर्शन पर आधारित है। पं. दीनदयाल भारत को केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के रूप में देखते थे। उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे दीनदयाल उपाध्याय की पुस्तकों का अध्ययन करें और उनके विचारों को समझें। “भारतीय दर्शन हमारी राष्ट्रीय पहचान का आधार है,” उन्होंने कहा।प्रांत संघ प्रचारक भवानी भीख तिवारी ने कहा कि देश के गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक मूल्यों को पुनर्स्मरण कराने का कार्य पं. दीनदयाल ने किया। उन्होंने भी युवाओं से उनके साहित्य को पढ़ने और विचारों को आत्मसात करने का आग्रह किया।
प्रतिकुलपति प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी ने अपने संबोधन में कहा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय ने विषम परिस्थितियों में जीवन व्यतीत किया, किंतु उनके भीतर ज्ञान का अपार भंडार था। उन्होंने कहा कि दीनदयाल जी आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि उन्होंने राष्ट्र की आत्मा को ‘चिति’ के रूप में परिभाषित किया और एकात्मता की कल्पना प्रस्तुत की। “भारतीय युवाओं में परिवर्तन लाने की अद्भुत क्षमता है। यदि वे एकात्म मानववाद को समझें, तो समाज और राष्ट्र में सकारात्मक बदलाव संभव है,” उन्होंने कहा। कार्यक्रम के माध्यम से विश्वविद्यालय परिसर में न केवल पं. दीनदयाल उपाध्याय को श्रद्धांजलि अर्पित की गई, बल्कि उनके ‘एकात्म मानववाद’ के सिद्धांतों पर गंभीर विमर्श भी हुआ। वक्ताओं ने इसे वर्तमान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों के संदर्भ में प्रासंगिक बताते हुए युवाओं को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम के अंत में कुलसचिव राकेश कुमार मिश्रा ने सभी अतिथियों एवं उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया। मंच संचालन डॉ. रत्नार्थु मिश्रा ने किया। इस अवसर पर डॉ श्रवण कुमार द्विवेदी, संगम बाजपेयी, डॉ अमित मिश्रा, डॉ मानस उपाध्याय, डॉ. योगेंद्र पांडेय, डॉ. सौरभ तिवारी, डॉ. इंद्रेश शुक्ला, डॉ. हरिओम कुमार सहित बड़ी संख्या में शिक्षकगण एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

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